विद्यालय के संस्थापक स्व. प्रेम प्रकाश शर्मा का विद्यालय की स्थापना के समय यह उद्देश्य था कि देश के भावी कर्णधार आज के शिशु अपनी संस्कृति को पहचानते हुए, उसे अपनाते हुए, विश्व बन्धुत्व में अपनी आस्था रखते हुए, एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करने में सहायक हो जो अशिक्षा, बेरोजगारी व शारीरिक-मानसिक कष्टों का निवारण करने में सक्षम हों। हम भारत की गौरवशाली संतान को भारत के गौरव तथा मर्यादा के अनुसार बनाने का प्रयास कर रहें हैं। हमारी शिक्षा, दीक्षा, क्रियाकलाप, देश के सम्मान को बढ़ाने वाले हों हमारे सभी प्रकार के कार्यों का केंद्र बिन्दु यह पुण्य भूमि हो। हमें ऐसे बालकों का निर्माण करना है जिनके चेहरे पर आभा, शरीर में बल, मन मे प्रचण्ड इच्छा शक्ति, बुद्धि में पांडित्य, जीवन में स्वावलम्बन, हृदय में शिवा, प्रताप, ध्रुव, प्रहलाद की जीवन गाथायें अंकित हों और जिनको देखकर महापुरूषों की स्मृतियाँ झंकृत हो उठे। हम प्रतिवर्ष अनेक सुरेश बनायें। यह थी वह महत्वाकाँक्षा, जिसे मूर्त रूप देने के लिए इस विद्यापीठ की स्थापना की गयी थी।